पितृ स्तोत्र (मार्कंडेय पुराण के अनुसार महर्षि रुचि द्वारा रचित श्री रुचिकृत पितृ स्तोत्र) पितरों की शांति, पितृदोष निवारण और पूर्वजों के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
श्री रुचिकृत पितृ स्तोत्रम्
अर्चितानाममूर्तानां पितॄणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम् ॥ १ ॥
(भावार्थ: जिनका कोई मूर्त रूप नहीं है, जो परम तेजस्वी हैं तथा दिव्य दृष्टि संपन्न और ध्यान मग्न रहते हैं, उन समस्त पितरों को मैं सदा प्रणाम करता हूँ।)
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
तान् नमस्यामि सर्वांश्च पितॄनक्षयकामिनाम् ॥ २ ॥
(भावार्थ: जो इंद्र आदि देवताओं, दक्ष और मरीचि आदि प्रजापतियों के भी मार्गदर्शक हैं, उन अक्षय फल की कामना रखने वाले समस्त पितरों को मैं नमन करता हूँ।)
नक्षत्राणां ग्रहाणां च चन्द्रार्कयोस्तथैव च ।
तान् नमस्यामि सर्वांश्च पितॄनप्युदधावपि ॥ ३ ॥
(भावार्थ: नक्षत्रों, ग्रहों, सूर्य, चंद्रमा तथा समुद्र में निवास करने वाले सभी पितृगणों को मेरा प्रणाम है।)
प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः ॥ ४ ॥
(भावार्थ: प्रजापति, कश्यप, चंद्र, वरुण और योगेश्वर स्वरूप पितरों के चरणों में, मैं हाथ जोड़कर सदा वंदन करता हूँ।)
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यः तथा लोकेषु सप्तसु ।
स्वयंभुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ॥ ५ ॥
(भावार्थ: सातों लोकों में स्थित सातों पितृगणों को मेरा नमस्कार है। योगदृष्टि से युक्त स्वयंभू ब्रह्माजी के समान पितरों को मैं प्रणाम करता हूँ।)
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ॥ ६ ॥
(भावार्थ: जो सोम (अमृत) के आधार हैं, योगमूर्ति धारण करते हैं और समस्त जगत के पिता स्वरूप हैं, उन सोमदेव और पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूँ।)
तेजसा ये च सूर्याय तुल्या वैश्वानराय च ।
तेभ्योऽपि च नमस्यामि पितृभ्यः सूर्यचक्षुषे ॥ ७ ॥
(भावार्थ: जो तेज में सूर्य और अग्नि के समान हैं तथा सूर्य के समान दृष्टि रखने वाले हैं, उन पितृगणों को मेरा नमस्कार है।)
पितॄन् नमस्ये निवसन्ति साक्षाद् ये देवलोकेऽथ महीतले वा ।
तथान्तरीक्षे च सुरासुरैश्च संवन्दितान् साधुभिरर्चितांश्च ॥ ८ ॥
(भावार्थ: जो साक्षात देवलोक, पृथ्वी अथवा अंतरिक्ष में निवास करते हैं और देवों, दानवों तथा श्रेष्ठ साधुओं द्वारा पूजित हैं, उन सभी पितरों को मैं सादर प्रणाम करता हूँ।)
पाठ विधि एवं महत्व:
* उचित समय: पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष), अमावस्या, सोमवती अमावस्या या प्रत्येक माह की श्राद्ध तिथि को दोपहर के समय (कुतप काल) इसका पाठ करना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।
* विधि: स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। गाय के घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं, एक लोटे जल में काले तिल मिलाकर तर्पण करें और श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करें।
* लाभ: इस स्तोत्र के पाठ से कुंडली का पितृदोष शांत होता है, परिवार में सुख-शांति, वंश वृद्धि और पितरों के आशीर्वाद से का
र्यों की बाधाएं दूर होती हैं।

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